विद्यार्थी परिषद का एक प्रकल्प है – SEIL Tour (Student Experience in Inter-State Living), जिसका एक बार मैं भी हिस्सा बना था। यह प्रकल्प पूर्वोत्तर भारत एवं देश के अन्य हिस्सों के बीच की खाई पाटने का एक बहुत ही खूबसूरत प्रयास है। इस कार्यक्रम में पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के दल को देश के अलग-अलग हिस्सों में घुमाने ले जाया जाता है। इन छात्रों को होटल में नहीं रुकवाया जाता था। यह छात्र जिस भी शहर में जाते, उस शहर में किसी के घर पर रुका करते जिनमें प्रायः कार्यकर्ता अधिक होते थे। एक घर में एक या दो छात्र रुकता। इस तरह 40 छात्र यदि हैं तो 30 से 40 घरों में रुकेंगे। मेरे घर पर जो छात्र रुका था वह मेघालय का था, ईसाई था। उसका ध्यान रखने से लेकर उसके साथ घुलना मिलना, उसे परिवार के सदस्य की तरह रखने की हम सबकी जिम्मेदारी थी। इस पूरी प्रक्रिया में हमने उसके बारे में जाना और उसने हमारे बारे में। भोजन, संस्कृति, परिवार इत्यादि विषयों पर बातें हुई। मेरे अलावा पूरा परिवार भी मेघालय को उसकी नजरों से समझ पाया।
यह एक तरफा नहीं था। ये 40 छात्र जिन घरों में रहे उनमें कुछ मेरे जैसे थे जो बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से थे और राजस्थान में बसे थे। जो राजस्थानी ही थे उनमें मारवाड़ी, मेवाड़ी, पूर्वी राजस्थान के लोग थे जिनकी संस्कृति, भोजन इत्यादि अलग है। हर घर का सिस्टम अलग था जिसे इन 40 छात्रों ने अगले दिन साझा किया।
खैर, ये लंबी कहानी बताने का उद्देश्य यह है कि इस समय पूर्वोत्तर के लोगों के साथ इस तरफ होने वाली होने वाली घटनाओं को पहले के मुकाबले बहुत-बहुत ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत है। अब उस पार्टी की सरकार है जिससे जुड़े संगठन बरसों से पूर्वोत्तर के साथ भेद मिटाने के लिये प्रकल्प चलाते हैं, गंभीर प्रयास करने का दावा करते हैं, उनके राज में भी अगर पूर्वोत्तर के लोगों में विश्वास नहीं जग पाया तो यह कभी नहीं हो पाएगा।
सरकार ने कई ऐसे काम जरूर किये हैं जिनसे आने वाले वर्षों में कनेक्टिविटी बढ़ेगी, सुरक्षा बलों को और अधिक बल मिलेगा लेकिन जब तक आम आदमी नहीं जुड़ेगा, तमाम प्रयास असफल रहेंगे। पूर्वोत्तर और बाकी भारत के लोगों के बीच दशकों की खाई है और उसे बदलने के लिये सरकार के साथ संगठनों को भी और तेजी से काम करना होगा। इस वक्त बहुत जरूरी है कि किसी भी राज्य, धर्म, जाति, भाषा वाले के साथ कोई भेदभाव हो तो उनपर बहुत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। अगर यह नहीं हुआ तो देश का तो जो नुकसान होना है वो होगा ही, राजनीतिक रूप से भाजपा भी धीरे-धीरे उस वर्ग का समर्थन खो देगी जो राष्ट्रवादी तो है लेकिन अंधभक्त नहीं। 2024 में यही वर्ग खिसका था और यही आगे भी खिसकेगा।
(अब आएंगे कुछ दोनों तरफ से यह बताने कि सारी समस्या दूसरी तरफ वाले की है। यानि कोई पहले का सब भूल कर सिर्फ आज को समस्या बताएगा, और कोई आज को भूल कर सिर्फ पहले की समस्या गिनएगा। हमें इन दोनों तरह के लोगों से सहानुभूति रखनी है।)