नाम की महिमा

कार पंचर हो गयी। बगल के गाँव में जाने वाला था कि किसी ने बताया कि अपने गाँव में भी है यहीं 200 मीटर दूर, ऑटो पंचर तो ठीक करता है कार भी कर देगा। मैं पहुंचा तो दुकान बंद… वहीं गपाष्टक मार रहे लोगों ने कहा कि फोन कर लो, नंबर सामने लिखा है।

मैंने जैसे ही नंबर मिलाया ट्रूकॉलर पर लिखा आया मंत्री जी… मैंने झट से फोन काट दिया। हाँ, मतलब होते हैं वो जनसेवा के लिए पर ये थोड़ी कि मंत्री जी को पंचर लगाने को फ़ोन करें। खैर, लोगों ने बताया कि अरे घबराओ नहीं, इसका नाम ही मंत्री है।

मैंने फोन लगाया पर उठा नहीं। लोगों ने कहा कि बाजार गया है, रुक जाइए अब तो आता ही होगा। 15 मिनट बाद फिर फोन लगाया, फिर नहीं उठा। मंत्री का फोन है, ऐसे कैसे उठे। मैंने सोचा दूसरे गाँव ही चलते हैं लेकिन चलने से पहले एक बार और फ़ोन लगा लिया। इस बार फोन उठ गया। मंत्री जी बोले कि अभी अररिया चौक पर टेम्पू में बैठे हैं, आते हैं 15 मिनट में। लेकिन मंत्री जी आधे घंटे बाद भी नहीं पहुंचे। फिर फोन करने पर बताये कि पर्सनल टेम्पू थोड़े है कि हमारे लिये ही चलेगा? इसका सवारी भरेगा तब चलेगा।

खैर मंत्री जी अपने दिये समय से 45 मिनट लेट पहुँचे। आते ही टायर देखा और बोले ट्यूबलेस है न, तुरंत हो जाएगा। उन्होंने कील निकालने का प्रयास किया पर निकला नहीं। बोले – “अंदर धंस गया कील, टायर निकाल कर करते हैं। लाइये जी, जैक और पाना दीजिये तो।”

– “तुम्हारे पास नहीं है?”

– “है तो पर अंदर रखा है, अब सब खोलेंगे ढूंढेंगे। उससे अच्छा आप दे दीजिये। टेम्पू वाला सब भी अपना ही देता है।”

सरकार से काम कहिए तो सरकार आप पर एक सैस और लगा देती है। मुझे तो सिर्फ जैक और पाना देना था। खैर, टायर खुला और मंत्री जी प्लास लेकर कील निकालने में लग गए लेकिन कील खिंचे ही नहीं। उन्होंने कील को घूरा और बोले – “निकलेगा नहीं रे…” और फिर प्लास कील पर गड़ा दिया।

कील ने शायद उनकी बात सुनी नहीं, इसलिए अब भी नहीं निकली। उल्टे जोर से खींचने पर प्लास फिसला और मंत्री जी गिरते-गिरते बचे। मंत्री अकेला क्या करेगा, जनभागीदारी आवश्यक है यह सोचकर मैंने ही प्लास पकड़ा और मंत्री जी को टायर पकड़ने को कहा। कील अंततः निकल गयी।

आप जानते ही हैं कि ट्यूबलेस टायर में जहाँ पंचर हो वहाँ सुआ घुसा कर छेद करते हैं और फिर सॉल्यूशन को एक और सुए से लगा देते हैं। अब मंत्री जी काम करें तो उसे पूरा न होने देने के लिये पूरी कायनात साजिश करती है। मंत्री जी लगे पंचर वाली जगह पर सूआ घुसाने पर सुआ घुसे ही नहीं। इस प्रयास जो हवा भरी थी वह निकल गई। मंत्री जी ने फिर हवा भरके सुआ डालना चाहा लेकिन फिर वही हाल…

मैंने कहा – “एक काम करो, स्टेपनी लगा दो… मैं इसे दूसरे गाँव में ठीक करवाता हूँ।”

ये सुनते ही मंत्री जी का चेहरा लटक गया। बहुत भावुक होकर बोले – “भाई जी, यहाँ हमारे रहते आप दूसरे गाँव में पंचर लगवाइएगा? क्या कहेगा उस गाँव का लोग? थाना हमारे गाँव में, ब्लॉक हमारा गाँव, पानी सप्लाई तक हमारे गाँव से होता है लेकिन पंचर लगेगा उस गाँव में?”

अब मामला सिर्फ पंचर का नहीं था मित्रों। गाँव के प्रति, अपनी मिट्टी के प्रति वफादारी और लगाव साबित करने का वक्त था। गाँवभक्ति ने उफान मारा और मैंने एक बार पुनः जनभागीदारी का निर्णय लिया लेकिन मेरा प्रयास भी असफल रहा।

मैंने देखा कि ये सुआ स्क्रू डिजाइन में है। मैंने मंत्री जी से कहा कि नॉर्मल वाला सुआ नहीं है क्या? ये सीधा घुसेगा ही नहीं और मैं इसे घुमाने लगूँगा तो टायर में हवा कम हो जाएगी। (सुआ तभी घुसेगा जब टायर में हवा फुल होगी।) जैसे कोई नेता असफल स्कीम को भविष्योन्मुखी बताता है वैसे ही मंत्री जी ने बताया:

– “अरे ये लेटेस्ट है भाई जी, आप घुमा के ही घुसाइये ना, मैं इधर से हवा भरता रहता हूँ।”

– “लेकिन ऐसे बहुत टाइम लगेगा और ज्यादा हवा से टायर फट जाएगा। तुम दूसरा सुआ लाओ…”

मंत्री जी ने मेरी बात अनसुनी करते हुए मुझे सुआ डालने को कहा और खुद हवा भरना शुरू करते हुए अपनी असफलता का ठीकरा टायर कंपनी पर फोड़ना शुरू किया।

– “जानते हैं भाई जी, ई सब जो टायर बनता है ना इसमें अंदर लोहा का पतला जाल होता है। इतना मजबूत होता है कि ई सुआ सब फैल (फेल) कर जाता है।”

जब दशरथ माँझी पहाड़ काट सकता है तो क्या मैं सुआ नहीं घुसा पाता? लोहे का पतला जाल काट कर सुआ टायर में वैसे ही घुस गया था जैसे सर्जिकल स्ट्राइक में हमारी सेना पाकिस्तान घुसी। अब समय था टायर की हवा टाइट करने का… मतलब सोल्यूशन लगाने का।

मैंने सुआ निकाला और मंत्री जी दूसरे सुए में सोल्यूशन लेकर टायर में डालना चाहा लेकिन उनका हाथ फिसल गया और सोल्यूशन अंदर जाने की जगह ऊपर ही चिपक गया। मैंने मंत्री जी से कहा कि इसे हटाओ, दूसरा लगाओ। मंत्री जी मुझे निरीह नजरों से देखा। जिस तरह जनता के काम के समय राजकोष खाली हो जाता है वैसे ही मंत्री जी के पास यह आखिरी सोल्यूशन था। 

एक वक्त आता है जब जनता भड़क ही जाती है और मंत्री दौड़ा दौड़ा काम करता है। यह वही समय था। मेरे पसीने से भरे और धूप में लाल हुए चेहरे को देख मंत्री दौड़ कर गया और पास से सोल्यूशन ले आया।

पंचर लगने के बाद मैंने मंत्री जी से मैंने पैसे पूछे। जवाब मिला – सौ रुपैया… मैंने कहा – अरे ट्यूबलेस का पंचर तो 50 में लगता है। मंत्री ने कहा – 100 ही है भाई जी…

मैंने कहा जब ऐसे ही मनमर्जी मांगना है तो 100 क्यों 200 माँग लेता। मंत्री जी ने जवाब दिया – “ऐसे कैसे नाजायज माँग लेते भाई जी, आप भी तो एतना मेहनत किये। दीजिए 100 रुपैया दे दीजिए।”

मेहनत करके पैसा आप कमाते हैं और उसके ऊपर टैक्स देते हैं। आपके उसी टैक्स के पैसे से सरकार थोड़ा-बहुत काम करती है और आपको एहसान तले दबा देती है कि देखिये हमने इतना तो किया। बस ऐसा ही पंचर वाले भैया मेरे साथ कर चुके थे। करते भी क्यों नहीं, नाम जो ‘मंत्री’ था।

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